Skip to main content
Source
One India
Author
Inzamam Wahidi
Date

IDR Report Bihar Chunav 2025: बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले एक ऐसी रिपोर्ट सामने आई है जिसने राजनीतिक व्यवस्था की सच्चाई को आईना दिखा दिया है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच द्वारा जारी यह रिपोर्ट विधायकों के हलफनामों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें न केवल आपराधिक मामलों का खुलासा हुआ है, बल्कि आर्थिक असमानता, शिक्षा स्तर और लैंगिक प्रतिनिधित्व जैसे गंभीर प्रश्न भी उठे हैं।

66% विधायक आपराधिक मामलों में घिरे - लोकतंत्र पर सवाल!

रिपोर्ट के अनुसार, विश्लेषित 241 विधायकों में से 158 (66%) के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं। यानी हर 3 में से 2 विधायक किसी न किसी आपराधिक केस का सामना कर रहे हैं। यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर खतरे का संकेत है, क्योंकि जनता के प्रतिनिधि न्यायालयों के कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं।

सत्ता में 'करोड़पतियों' का बोलबाला

वित्तीय स्थिति को देखें तो तस्वीर और भी असमान दिखती है।

194 विधायक (80%) करोड़पति

कुल संपत्ति: ₹1,121.6 करोड़

औसत संपत्ति प्रति विधायक: ₹4.7 करोड़

यह स्थिति बताती है कि राजनीति अब आम आदमी की नहीं, बल्कि पूंजी और पहुंच रखने वालों की राह बन चुकी है।

शिक्षा स्तर: आधे से ज्यादा उच्च शिक्षित, लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

शिक्षा के मोर्चे पर राहत तो है लेकिन सवाल भी हैं।

82 विधायक (34%): 5वीं से 12वीं पास

149 विधायक (62%): स्नातक या उससे अधिक

यह दिखाता है कि उच्च शिक्षा का दायरा बढ़ा है, लेकिन 34% विधायकों का शिक्षा स्तर नीतिगत जटिलताओं के लिए पर्याप्त है या नहीं यह चर्चा का विषय है।

उम्र का संतुलन - अनुभव बनाम युवा ऊर्जा

25-50 वर्ष: 119 विधायक (49%)

51-80 वर्ष: 122 विधायक (51%)

बिहार विधानसभा आधी युवा और आधी अनुभवी नेतृत्व का मिश्रण प्रतीत होती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या युवा नेतृत्व को पर्याप्त निर्णयकारी भूमिका मिल रही है?

सिर्फ 12% महिलाएं - प्रतिनिधित्व में भारी कमी

241 विधायकों में केवल 29 महिलाएं (12%) हैं।

यह आंकड़ा दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में महिलाएं अब भी हाशिए पर हैं। 'अर्धांगिनी' होने के बावजूद उन्हें फैसला लेने वाली टेबल पर जगह नहीं मिल पा रही।

कौन सी पार्टी सबसे अमीर? कौन सबसे 'साफ'?
बिहार विधानसभा में करोड़पति विधायकों की संख्या हैरान करने वाली है। सबसे आगे है निर्दलीय विधायक, जहां दोनों (2 में से 2) विधायक 100% करोड़पति हैं। मुख्य दलों में आरजेडी सबसे ऊपर है-72 विधायकों में से 63 करोड़पति हैं, यानी 88%। इसके ठीक पीछे बीजेपी आती है, जिसके 83 में से 72 विधायक करोड़पति हैं (87%)। तीसरे स्थान पर है जेडीयू, जहां 47 में से 39 विधायक करोड़पति हैं, यानी 83%।

कांग्रेस के भी 17 में से 13 विधायक करोड़पति हैं, जो 76% का आंकड़ा दिखाता है। छोटे दलों में हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के 4 में से 2 विधायक करोड़पति हैं (50%)। इसी तरह CPI और CPI(M) में भी 2-2 में से 1-1 विधायक करोड़पति हैं, यानी 50%। सबसे कम करोड़पति विधायक CPI (ML-L) में हैं-11 में से सिर्फ 1 विधायक, यानी मात्र 9%।

स्पष्ट है कि मुख्यधारा पार्टियों में "कम्पिटीशन करोड़पति बनने का" है। CPI(ML) जैसी वामपंथी पार्टी में केवल 9% करोड़पति-यह उनकी वैचारिक सादगी को दर्शाता है।

आपराधिक मामलों में बदलाव की गुंजाइश

ADR ने यह भी कहा कि समय के साथ कुछ विधायकों के मामलों में वृद्धि या कमी हो सकती है। साथ ही, बीजेपी के राम सूरत कुमार (औराई) और जेडीयू के प्रहलाद यादव के हलफनामों की पूरी स्कैन कॉपी उपलब्ध न होने के कारण डेटा अधूरा है।

जनता क्या चुनेगी - चेहरा या चरित्र?

यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर लगा प्रश्नचिह्न है।

क्या अपराधी छवि वाले नेताओं को टिकट मिलना बंद होगा?

क्या धनबल पर आधारित राजनीति को चुनौती मिलेगी?

क्या महिलाएं और युवा सच में प्रतिनिधित्व पाएंगे?

क्या जनता जागरूक होकर "साफ-सुथरे विकल्प" चुनेगी?

आगामी चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति बदलने का मौका हो सकता है-बशर्ते जनता मुद्दों के आधार पर वोट करे।


abc